Tuesday, September 22, 2015

Murli (Hindi & English) & Murli Song: -22-09-2015

22-09-15 प्रातः मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन

“मीठे बच्चे - जब तुम फूल बनेंगे, तब यह भारत काँटों के जंगल से सम्पूर्ण फूलों का बगीचा बनेगा, बाबा आया है तुम्हें फूल बनाने”  

प्रश्न:
मन्दिर लायक बनने के लिए किन बातों पर विशेष ध्यान देना है?

उत्तर:
मन्दिर लायक बनना है तो चलन पर विशेष ध्यान दो - चलन बहुत मीठी और रॉयल होनी चाहिए। इतना मीठापन हो जो दूसरों को उसकी महसूसता आये। अनेकों को बाप का परिचय दो। अपना कल्याण करने के लिए अच्छी रीति पुरूषार्थ कर सर्विस पर लगे रहो।

गीतः
बदल जाए दुनिया न बदलेंगे हम........

ओम् शान्ति।
रूहानी बच्चे जानते हैं कि बाप ब्रह्मा द्वारा समझा रहे हैं। ब्रह्मा के रथ द्वारा ही समझाते रहते हैं। हम यह प्रतिज्ञा करते हैं कि श्रीमत पर हम इस भारत की भूमि को पतित से पावन बनायेंगे। भारत खास और दुनिया आम, सबको हम पतित से पावन बनने का रास्ता बताते हैं। इतने ख्यालात हर एक को अपनी बुद्धि में रखना है। बाप कहते हैं ड्रामा अनुसार जब तुम फूल बन जायेंगे और जब समय आ जायेगा तो सम्पूर्ण बगीचा बन जायेगा। बागवान भी निराकार को कहा जाता है, माली भी निराकार को कहा जाता है, साकार को नहीं। माली भी आत्मा है, न कि शरीर। बागवान भी आत्मा है। बाप समझायेंगे तो जरूर शरीर द्वारा ना। शरीर के साथ ही उनको माली बागवान कहा जाता है, जो इस विश्व को फूलों का बगीचा बनाते हैं। बगीचा था जहाँ यह देवतायें रहते थे। वहाँ कोई दु:ख नहीं था। यहाँ इस कांटों के जंगल में तो दु:ख है, रावण का राज्य है, कांटों का जंगल है। फट से कोई फूल नहीं बनते। देवताओं के आगे जाकर गाते भी हैं कि हम जन्म- जन्मान्तर के पापी हैं, अजामिल हैं। ऐसी प्रार्थना करते हैं, अब आकर हमको पुण्य आत्मा बनाओ। समझते हैं अभी हम पाप आत्मा हैं। कोई समय पुण्य आत्मा थे। अभी इस दुनिया में पुण्य आत्माओं के सिर्फ चित्र हैं। राजधानी के हेड्स के चित्र हैं और उन्हों को ऐसा बनाने वाला निराकार है शिव। उनका चित्र है, बस। और कोई चित्र हैं नहीं। इसमें भी शिव का तो बड़ा लिंग बना देते हैं। कहते भी हैं कि आत्मा स्टार मिसल है, तो जरूर बाप भी ऐसा होगा ना। परन्तु उनकी पूरी पहचान नहीं है। इन लक्ष्मी-नारायण का विश्व में राज्य था। इनके लिए कहाँ भी कोई ग्लानि की बात नहीं लिखते। बाकी कृष्ण को कब द्वापर में, कब कहाँ ले जाते। लक्ष्मी-नारायण के लिए सब कहेंगे स्वर्ग के मालिक थे। यह है तुम्हारी एम आब्जेक्ट। राधे-कृष्ण कौन हैं - मनुष्य बिचारे एकदम मूंझे हुए हैं, कुछ नहीं समझते। जो बाप द्वारा समझते हैं, वह समझाने लायक भी बनते हैं। नहीं तो लायक बन नहीं सकते। दैवीगुण धारण कर नहीं सकते। भल कितना भी समझाओ। परन्तु ड्रामा अनुसार ऐसा होना ही है। तुम अभी खुद समझते हो हम सब बच्चे बाप की श्रीमत पर भारत की रूहानी सर्विस करते हैं अपने ही तन-मन-धन से। प्रदर्शनी अथवा म्यूजियम आदि में पूछते हैं तुम भारत की क्या सेवा करते हो? तुम जानते हो हम भारत की बहुत अच्छी सर्विस करते हैं, जंगल से बगीचा बना रहे हैं। सतयुग है गार्डन। यह है काँटों का जंगल। एक-दो को दु:ख देते रहते हैं। यह तुम अच्छी रीति समझा सकते हो। लक्ष्मी-नारायण का चित्र भी बहुत अच्छा बनाना चाहिए। मन्दिरों में बहुत खूबसूरत चित्र बनाते हैं। कहाँ गोरा, कहाँ सांवरा चित्र बनाते, उनका क्या राज़ है, यह भी समझते नहीं। तुम बच्चों को अभी यह सारा ज्ञान है। बाप कहते हैं मैं आकर सबको मन्दिर लायक बनाता हूँ, परन्तु सब मन्दिर लायक नहीं बनते हैं। प्रजा को तो मन्दिर लायक नहीं कहेंगे ना। प्रजा उन्हों की होगी जो पुरूषार्थ कर बहुत सर्विस करते हैं।

तुम बच्चों को रूहानी सोशल सर्विस भी करनी है, इस सेवा में अपना जीवन सफल करना है। चलन भी बहुत मीठी सुन्दर होनी चाहिए, जो औरों को भी मीठे-पन से समझा सकें। खुद ही कांटा होगा तो किसको फूल कैसे बनायेंगे, उनका तीर पूरा लगेगा नहीं। बाप को याद नहीं करते होंगे तो तीर कैसे लगेगा। अपने कल्याण के लिए अच्छी रीति पुरूषार्थ कर सर्विस में लगे रहो। बाप भी सर्विस पर है ना। तुम बच्चे भी दिन-रात सर्विस पर रहो।

दूसरी बात, समझाते हैं शिवजयन्ती पर बहुत बच्चे तारें भेज देते हैं, उनमें भी ऐसी लिखत लिखनी चाहिए जो वह तारें किसको भी दिखायें तो समझ जाएं। आगे के लिए क्या करना है, उसका पुरूषार्थ किया जाता है। सेमीनार भी इसलिए करते हैं कि क्या-क्या सर्विस करें जो बहुतों को बाप का परिचय मिले। तारें ढेर रखी हैं, इनसे बहुत काम ले सकते हो। एड्रेस डालते हैं शिवबाबा केयरऑफ ब्रहमा। प्रजापिता ब्रह्मा भी है, वह रूहानी पिता, वह जिस्मानी। उनसे जिस्मानी रचना रची जाती है। बाप है मनुष्य सृष्टि का रचता। कैसे रचना रचते हैं, यह दुनिया भर में कोई नहीं जानते। बाप ब्रह्मा द्वारा अब नई रचना रच रहे हैं। ब्राह्मण हैं चोटी। पहले-पहले ब्राह्मण जरूर चाहिए। विराट रूप की है यह चोटी। ब्राह्मण, देवता, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। पहले शूद्र तो नहीं हो सकते। बाप ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण रचते हैं। शूद्र कैसे और किस द्वारा रचेंगे?

तुम बच्चे जानते हो कैसे नई रचना रचते हैं, यह एडाप्शन है बाप की। कल्प-कल्प बाप आकर शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं फिर ब्राह्मण से देवता बनाते हैं। ब्राह्मणों की सर्विस बहुत ऊंची है। वह ब्राह्मण लोग खुद ही पवित्र नहीं हैं तो दूसरे को पवित्र कैसे बनायेंगे। कोई भी ब्राह्मण सन्यासी को कभी राखी नहीं बांधेंगे। वह कहेंगे हम तो हैं ही पवित्र। तुम अपना मुंह देखो। तुम बच्चे भी कोई से राखी नहीं बंधवा सकते। दुनिया में तो सब एक-दो को बांधते हैं। बहन-भाई को बांधती है, यह रिवाज अभी निकला है। अभी तुम शूद्र से ब्राह्मण बनने के लिए पुरूषार्थ करते हो। समझाना पड़ता है। मेल-फीमेल दोनों पवित्रता की प्रतिज्ञा करते हैं, दोनों बता सकते हैं कि हम कैसे बाप की श्रीमत से पवित्र रहते हैं। अन्त तक इस काम विकार पर जीत रहे तो पवित्र जगत का मालिक बनेंगे। पवित्र दुनिया सतयुग को कहा जाता है, सो अब स्थापन हो रही है। तुम सब पवित्र हो। विकार में गिरने वाले को राखी बांध सकते हो। प्रतिज्ञा कर और फिर पतित बने तो कहेंगे तुम राखी बंधवाने आये थे फिर क्या हुआ? कहेंगे माया से हार खा ली, यह है युद्ध का मैदान। विकार बड़ा दुश्मन है। इन पर जीत पाने से ही जगतजीत अर्थात् राजा-रानी बनना है, प्रजा को जगतजीत नहीं कहेंगे। मेहनत तो राजा-रानी करते हैं ना। कहते भी हैं हम तो लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। वह फिर राम-सीता भी बनेंगे। लक्ष्मी-नारायण के बाद उनके तख्त पर जीत, उनके बच्चे की होती है। वह लक्ष्मी-नारायण फिर दूसरे जन्म में नीचे चले जायेंगे। भिन्न नाम-रूप से बच्चे को गद्दी मिलती है तो ऊंच नम्बर गिना जायेगा। पुनर्जन्म तो लेते हैं ना। बच्चा तख्त पर बैठेगा तो वह सेकण्ड ग्रेड हो जायेगा। ऊपर वाला नीचे, नीचे वाला ऊपर आ जायेगा। तो अब बच्चों को ऐसा ऊंच बनना है तो सर्विस में लग जाना चाहिए। पवित्र होना भी बहुत जरूरी है। बाप कहते हैं मैं पवित्र दुनिया बनाता हूँ। अच्छा पुरूषार्थ थोड़े करते हैं, पवित्र तो सारी दुनिया बन जाती है। तुम्हारे लिए स्वर्ग की स्थापना करते हैं। यह ड्रामा अनुसार होना ही है, यह खेल बना हुआ है। तुम पवित्र बन जाते हो फिर विनाश शुरू हो जाता है। सतयुग की स्थापना हो जाती है। ड्रामा को तो तुम समझ सकते हो। सतयुग में था देवताओं का राज्य। अभी नहीं है फिर होना है।

तुम हो रूहानी मिलेट्री। तुम 5 विकारों पर जीत पाने से जगत जीत बनने वाले हो। जन्म-जन्मान्तर के पाप कटने लिए बाबा युक्तियाँ बताते हैं। बाप एक ही बार आकर युक्ति बताते हैं। जब तक राजधानी स्थापन न हो जाए तब तक विनाश नहीं होगा। तुम बहुत गुप्त वारियर्स हो। सतयुग होना ही है कलियुग के बाद। फिर सतयुग में कभी लड़ाई होती नहीं। तुम बच्चे जानते हो सब आत्मायें जो भी पार्ट बजाती हैं, वह सब नूंधा हुआ है। जैसे कठपुतलियाँ होती हैं ना, ऐसे नाचती रहती हैं। यह भी ड्रामा है, हर एक का इस ड्रामा में पार्ट है। पार्ट बजाते-बजाते तुम तमोप्रधान बने हो। फिर अब ऊपर जाते हो, सतोप्रधान बनते हो। नॉलेज तो सेकण्ड की है। सतोप्रधान बनते हैं फिर गिरते-गिरते तमोप्रधान बनते हैं। फिर बाप ऊपर ले जाते हैं। वास्तव में वह मछलियाँ तार में लटकती हैं, इस तार में मनुष्यों को डालना चाहिए। ऐसे उतरती कला फिर चढ़ती कला होती है। तुम भी ऐसे चढ़ते हो फिर उतरते-उतरते नीचे आ जाते हो। 5 हज़ार वर्ष लगते हैं ऊपर जाकर फिर उतरने में। यह 84 का चक्र तुम्हारी बुद्धि में है। उतरती कला और चढ़ती कला का राज़ बाप ने ही समझाया है। तुम्हारे में भी नम्बरवार जानते हैं और फिर पुरूषार्थ करते हैं, जो बाप को याद करते हैं वह जल्दी ऊपर जाते हैं। यह प्रवृत्ति मार्ग है। जैसे जोड़ी को दौड़ाते हैं तो जोड़ी का एक-एक पांव बांधते हैं फिर दौड़ते हैं। यह भी तुम्हारी दौड़ी है ना। कोई की प्रैक्टिस नहीं होती है तो गिर पड़ते हैं, इसमें भी ऐसे होता है। एक आगे बढ़ता है, तो दूसरा रोक लेता है, कहाँ दोनों गिर पड़ते हैं। बाबा वन्डर खाते हैं - बूढ़ों को भी काम की आग लगती है तो वह भी गिर पड़ते हैं। ऐसे थोड़ेही उसने गिराया। गिरना, न गिरना अपने हाथ में है। कोई धक्का थोड़ेही देते हैं, हम गिरें क्यों? कुछ भी हो जाए हम गिरेंगे नहीं। गिरे तो खाना खराब, जोर से चमाट लगती है। फिर पछताते भी हैं, हड्डी-हड्डी टूट जाती है। बहुत चोट लगती है। बाबा भिन्न-भिन्न प्रकार से समझाते रहते हैं।

यह भी समझाया शिव जयन्ती पर तारें ऐसी आनी चाहिए जो मनुष्य पढ़ने से समझ जाएं। विचार सागर मंथन करने के लिए बाबा टाइम देते हैं। कोई देखें तो वन्डर खाये। कितनी चिट्ठियां आती हैं, सब लिखते हैं बापदादा। तुम समझा भी सकते हो शिवबाबा को बाप, ब्रह्मा को दादा कहते हैं। एक को कभी कोई बापदादा कहते हैं क्या? यह तो वन्डरफुल बात है, इसमें सच्चा-सच्चा ज्ञान है। परन्तु याद में रहें तब किसको तीर भी लगे। घड़ी-घड़ी देह-अभिमान में आ जाते हैं। बाप कहते हैं आत्म-अभिमानी बनो। आत्मा ही शरीर धारण कर पार्ट बजाती है। कोई मरता है तो भी कोई ख्याल नहीं। आत्मा में जो पार्ट की नूंध है उसको हम साक्षी हो देखते हैं। उनको एक शरीर छोड़ दूसरा ले पार्ट बजाना है। इसमें हम कर ही क्या सकते हैं? यह ज्ञान भी तुम्हारी बुद्धि में है। वह भी नम्बरवार। कईयों की बुद्धि में तो ठहरता ही नहीं। इसलिए किसको समझा नहीं सकते। आत्मा बिल्कुल ही गर्म तवा, तमोप्रधान पतित है। उन पर ज्ञान अमृत डाला जाता है तो ठहरता नहीं। जिसने बहुत भक्ति की है, उनको ही तीर लगेगा, झट धारणा होगी। हिसाब ही वन्डरफुल है - पहले नम्बर में पावन, वही फिर पतित बनते हैं। यह भी कितनी समझने की बातें होती हैं। कोई की तकदीर में नहीं है तो पढ़ाई को छोड़ देते हैं। अगर छोटेपन से ही नॉलेज में लग जाएं तो धारणा होती जायेगी। समझेंगे इसने बहुत भक्ति की हुई है, बहुत होशियार हो जाए, क्योंकि आरगन्स बड़े होने से फिर समझ भी जास्ती आती है। जिस्मानी, रूहानी दोनों तरफ अटेन्शन देने से फिर वह असर निकल जाता है। यह है ईश्वरीय पढ़ाई। फ़र्क है ना। परन्तु जब वह लगन भी लगे ना। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते। 

धारणा के लिए मुख्य सार:
1) रूहानी मिलेट्री बन 5 विकारों पर जीत पानी है, पवित्र जरूर बनना है। श्रीमत पर भारत को पावन बनाने की सेवा करनी है।
2) इस बेहद नाटक में हर पार्ट आत्म-अभिमानी होकर बजाना है, कभी भी देह-अभिमान में नहीं आना है। साक्षी होकर हर एक एक्टर का पार्ट देखना है।

वरदान:
अनेक प्रकार की प्रवृत्ति से निवृत्त होने वाले नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप भव !   

स्व की प्रवृत्ति, दैवी परिवार की प्रवृत्ति, सेवा की प्रवृत्ति, हद के प्राप्तियों की प्रवृत्ति इन सभी से नष्टोमोहा अर्थात् न्यारा बनने के लिए बापदादा के स्नेह रूप को सामने रख स्मृति स्वरूप बनो। स्मृति स्वरूप बनने से नष्टोमोहा स्वत: बन जायेंगे। प्रवृत्ति से निवृत्त होना अर्थात् मैं पन को समाप्त कर नष्टोमोहा बनना। ऐसे नष्टोमोहा बनने वाले बच्चे बहुतकाल के पुरूषार्थ से बहुतकाल के प्रालब्ध की प्राप्ति के अधिकारी बनेंगे।

स्लोगन:
कमल फूल समान न्यारे रहो तो प्रभू का प्यार मिलता रहेगा।   
 
22/09/15 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban

Sweet children, when you become flowers, this Bharat will change from a forest of thorns and become a complete garden of flowers. Baba has come to make you into flowers.   

Question:
In order to become worthy of being in a temple, to what aspects should you pay special attention?

Answer:
In order to become worthy of being in a temple, pay special attention to your behaviour. Your behaviour should be very sweet and royal. There should be such sweetness that others can feel your sweetness. Give many others the Father’s introduction. In order to benefit yourself, make effort very well and remain engaged in service.

Song:
Even though the world may change, we shall never change.
Om Shanti

You spiritual children know that the Father explains to us through Brahma. He continues to explain through Brahma’s chariot. We have promised Him that we will follow shrimat and change this impure land of Bharat and make it pure. We shall show everyone the path to change Bharat in particular, and the world in general, from impure to pure. Each one of you has to keep all of these concerns in your intellect. The Father says: When the time comes, according to the drama, and you have become flowers, your garden will be completely ready. The Master of the Garden, the Gardener, is the incorporeal One not the corporeal one. The Gardener is a soul, not a body. The Master of the Garden is a soul. The Father definitely has to explain through a body. It is when He is in this body that He is called the Gardener and the Master of the Garden because He is making this world into a garden of flowers. There used to be a garden where those deities resided; there was no sorrow there. There is sorrow here, in this forest of thorns. This is Ravan’s kingdom, the forest of thorns. No one becomes a flower instantly. They go in front of the idols of the deities and sing: We have been sinners for birth after birth. We are like Ajamil (a very great sinner). They pray to God to come and make them into charitable souls. They understand that they are sinful souls at present and that they were charitable souls at some time. Now, in this old world, there are only the images of the charitable souls. There are the images of the heads of the kingdom. It was incorporeal Shiva who made them like that. There are images of only them, no one else. Then they created a huge lingam to represent Shiva. They say that a soul is like a star. Therefore, the Father too would surely be like that. However, they don’t have full recognition of Him. It used to be the kingdom of Lakshmi and Narayan over the whole world. People don’t write anything defamatory about Lakshmi and Narayan anywhere. However, for Krishna, they sometimes portray him in the copper age and sometimes somewhere else. Everyone says that Lakshmi and Narayan were the masters of heaven. This is your aim and objective. Who are Radhe and Krishna? The poor helpless people are completely confused; they don’t understand anything. Those who come to understand this from the Father are also able to explain to others. Otherwise, no matter how much you explain to them, they cannot become worthy and they remain unable to imbibe divine virtues. However, according to the drama, it has to happen like that. You children can understand for yourselves that you all have to follow the Father’s shrimat and do spiritual service of Bharat with your bodies, minds and wealth. People at your exhibitions and museums ask you how you are serving Bharat. You know that you are serving Bharat very well by changing it from a forest into a garden. The golden age is a garden whereas this is a forest of thorns, where everyone continues to cause sorrow for one another. You can explain this very well. You should make a very good picture of Lakshmi and Narayan. Very beautiful pictures of them have been created, and shown in the temples. Sometimes, the pictures are beautiful and sometimes, they are dark bluish but people don’t understand the meaning of that. You children now have all this knowledge. The Father says: I have come to make all of you worthy of being in a temple. However, not everyone will become worthy of being in a temple. Subjects are not called worthy of being in a temple. Only those who make effort and do a lot of service will have subjects. You children also have to do spiritual social service. Make your life worthwhile in this service. Your behaviour has to be so sweet and lovely that you can explain to others with sweetness. If you are a thorn yourself, how could you make others into flowers? Your arrow wouldn’t strike the target. If you do not remember the Father, how would the arrow strike the target? In order to benefit yourself, make effort very well and remain engaged in service. The Father is always on service, is He not? You children must also remain on service day and night. Secondly, Baba explains that many children send telegrams on Shiva Jayanti. In those, there should also be such a good explanation that anyone who reads them will understand the meaning of Shiva Jayanti. Effort has to be made for the future. Seminars too are held to decide what service can be done so that many receive the Father’s introduction. There are many examples of telegrams here; you can make plenty of use of them. The address written is Shiv Baba c/o Brahma. There is also Prajapita Brahma (the Father of the People). That One is the spiritual Father and this one is the physical father. The physical creation is created through this one. The Father is the Creator of the human world. No one in the whole world knows how He creates creation. The Father is now creating the new creation through Brahma. Brahmins are the topknot. First of all, Brahmins are definitely needed. They are the topknot of the variety-form image: Brahmins, deities, warriors, merchants and shudras. Shudras cannot be first. The Father creates Brahmins through Brahma. How and through whom would He create shudras? You children understand how the new creation is created. This is done by the Father adopting you. The Father comes every cycle to change you from shudras into Brahmins. Then, from Brahmins, He makes you into deities. The service of Brahmins is very elevated. Those brahmins are not pure themselves, so how could they purify anyone else? A brahmin priest does not tie a rakhi on a sannyasi. The sannyasi would say: I am pure anyway! First, look at your own face! You children too must not have a rakhi tied on you by anyone else. In the world outside, they tie a rakhi on one another. The system of a sister tying a rakhi on her brother has emerged recently. You are now making effort to change from shudras into Brahmins. You have to explain that both males and females make a promise of purity. Both can relate how they remain pure by following the Father’s shrimat. We shall remain victorious over the vice of lust until the end, so that we become the masters of the pure world. The golden age is called the pure world which is now being established. All of you are pure. Rakhis can be tied on those who have fallen into vice. If someone makes a promise and then becomes impure, it is said: You came and had a rakhi tied on you. So, what happened? He would say: I was defeated by Maya. This is a battlefield. Lust is a great enemy. It is by conquering this vice that you become conquerors of the world, that is, kings and queens. Subjects are not said to be conquerors of the world; it is those who become kings and queens who make effort now. Some say that they will become like Lakshmi and Narayan. Such ones then become like Rama and Sita. It is Lakshmi and Narayan’s children who come and claim their throne. Lakshmi and Narayan will then become lower in their next birth. Their children receive the throne under a different name and form. Therefore, their number (position) is said to be higher. They do take rebirth. When their son sits on the throne, they become second grade. The ones who were higher come down and the ones who were lower become higher. If you children want to become as elevated as that, you have to become engaged in service. It is most essential to become pure. The Father says: I make the world pure. Very few make effort well. However, the whole world becomes pure anyway. Heaven is being established for you. This has to happen according to the drama. This play is predestined. When you have become pure, destruction will begin and the golden age will be established. You can understand the drama. In the golden age it was the kingdom of deities. That doesn’t exist now, but it will exist again. You are the spiritual military. You are going to conquer the world by conquering the five vices. The Father continues to show you ways to remove your sins of many births. The Father only comes once to tell you these methods. Destruction will not take place until the kingdom has been established. You warriors are very incognito. The golden age will exist after the iron age. There won’t be any battling in the golden age. You children know that the part each soul plays is fixed in the drama. Souls continue to dance like puppets. This too is the drama. Each one has a part in this drama. You have become tamopradhan while playing your parts. You are now ascending, becoming satopradhan. The knowledge is of just a second. You become satopradhan and you then fall and become tamopradhan. Then, the Father takes you back up. In fact, instead of those fish that dangle on a string, it should be humans that dangle on that string (children’s toy). The stage of descending and the stage of ascending is shown in that way. You too ascend and then you gradually come down. After you go up, it takes 5000 years to come down again. This cycle of 84 births is in your intellects. The Father has explained to you the significance of the stage of ascending and the stage of descending. Among you, too, you understand this, numberwise, and you make effort accordingly. Those who remember the Father will go up quickly. This is the family path. Sometimes, they have three-legged races in which one leg of each of two people are tied together, and then they race. This too is your race. When someone doesn’t have the practice of doing that, he falls. It is the same here too. One runs ahead and the other one stops him. Sometimes, both of them fall. Baba is amazed! Even old people are affected by the fire of lust and so they fall. You can’t say that someone made you fall. It is in your hands whether you fall or not. No one is pushing you; so why should you fall? You must think: No matter what happens, I will not fall. If you fall, everything is ruined and you get slapped very hard. Then you repent. All your bones are broken; you become hurt so much. Baba continues to explain to you in many different ways. It has also been explained to you that such telegram messages should be sent on Shiva Jayanti that people can understand them as soon as they read them. Baba gives you time to churn the ocean of knowledge. When people see these, they will become amazed. So many letters come to Baba. “BapDada” is written on all of them. You can explain that Shiv Baba is Bap, and that Brahma is Dada. Would just one soul be called BapDada? This is something wonderful! It contains true knowledge (The combined form). However, the arrow can only strike someone when you stay in remembrance. Some become body conscious very quickly. The Father says: Become soul conscious! It is souls that adopt bodies and play their parts. If someone dies, you mustn’t have any thoughts about it. We observe as detached observers the part that is fixed for that soul. The soul has to shed his body and take another to play his part. What can we do about that? You have this knowledge in your intellects. This too is numberwise; it doesn’t stay in the intellects of some. This is why they are unable to explain to anyone. Such souls become like a hot griddle, completely impure and degraded. When the nectar of knowledge is given to such souls, it won’t stay. Only those who have done a lot of devotion will be pierced by the arrow. They will be able to imbibe this quickly. It is a wonderful account. The number one pure soul then becomes the most impure. These matters have to be understood. If it is not in their fortune, they stop studying. When they become engaged in knowledge from childhood, they continue to imbibe everything. It can then be understood that they have done a lot of devotion and that they will become very clever, because, as they grow older, their organs too will grow and they will be able to understand more. By paying attention to both the physical and the spiritual, any (negative) effect is removed. This is God’s study. There is a difference. However, there first has to be that deep love. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children. 
Essence for Dharna:
1. Become the spiritual military and gain victory over the five vices and definitely become pure. Serve to make Bharat pure according to shrimat.
2. Play every part in this unlimited play while being soul conscious.Never become body conscious. Become a detached observer and observe the part of every actor.

Blessing:
May you be a conqueror of attachment and an embodiment of remembrance by becoming free from the many types of household.   

In order to become a conqueror of attachment to the many types of household – household of the self, of the divine family, of service and of limited attainments – keep the loving form of BapDada in front of you and become an embodiment of remembrance. By becoming an embodiment of remembrance, you will automatically become a conqueror of attachment. To be free from the household means to finish the consciousness of “I” and to become a conqueror of attachment. Children who become such conquerors of attachment claim a right to the attainment of a reward for a long period of time by making effort over a long period of time.

Slogan:
Remain as detached as a lotus and you will continue to receive God’s love.   

Essence of Murli (Hindi & English) & Murli Song: 

मीठे बच्चे - जब तुम फूल बनेंगे, तब यह भारत काँटों के जंगल से सम्पूर्ण फूलों का बगीचा बनेगा, बाबा आया है तुम्हें फूल बनाने”  

प्रश्न:
मन्दिर लायक बनने के लिए किन बातों पर विशेष ध्यान देना है?

उत्तर:
मन्दिर लायक बनना है तो चलन पर विशेष ध्यान दो - चलन बहुत मीठी और रॉयल होनी चाहिए। इतना मीठापन हो जो दूसरों को उसकी महसूसता आये। अनेकों को बाप का परिचय दो। अपना कल्याण करने के लिए अच्छी रीति पुरूषार्थ कर सर्विस पर लगे रहो।

गीतः बदल जाए दुनिया न बदलेंगे हम...

ओम् शान्ति।
धारणा के लिए मुख्य सार:
1) रूहानी मिलेट्री बन 5 विकारों पर जीत पानी है, पवित्र जरूर बनना है। श्रीमत पर भारत को पावन बनाने की सेवा करनी है।
2) इस बेहद नाटक में हर पार्ट आत्म-अभिमानी होकर बजाना है, कभी भी देह-अभिमान में नहीं आना है। साक्षी होकर हर एक एक्टर का पार्ट देखना है।

वरदान:
अनेक प्रकार की प्रवृत्ति से निवृत्त होने वाले नष्टोमोहा स्मृति स्वरूप भव !   

स्व की प्रवृत्ति, दैवी परिवार की प्रवृत्ति, सेवा की प्रवृत्ति, हद के प्राप्तियों की प्रवृत्ति इन सभी से नष्टोमोहा अर्थात् न्यारा बनने के लिए बापदादा के स्नेह रूप को सामने रख स्मृति स्वरूप बनो। स्मृति स्वरूप बनने से नष्टोमोहा स्वत: बन जायेंगे। प्रवृत्ति से निवृत्त होना अर्थात् मैं पन को समाप्त कर नष्टोमोहा बनना। ऐसे नष्टोमोहा बनने वाले बच्चे बहुतकाल के पुरूषार्थ से बहुतकाल के प्रालब्ध की प्राप्ति के अधिकारी बनेंगे।

स्लोगन:
कमल फूल समान न्यारे रहो तो प्रभू का प्यार मिलता रहेगा। 

Sweet children, when you become flowers, this Bharat will change from a forest of thorns and become a complete garden of flowers. Baba has come to make you into flowers.   

Question:
In order to become worthy of being in a temple, to what aspects should you pay special attention?
Answer:
In order to become worthy of being in a temple, pay special attention to your behaviour. Your behaviour should be very sweet and royal. There should be such sweetness that others can feel your sweetness. Give many others the Father’s introduction. In order to benefit yourself, make effort very well and remain engaged in service.

Song: Even though the world may change, we shall never change...

Om Shanti.
Essence for Dharna:
1. Become the spiritual military and gain victory over the five vices and definitely become pure. Serve to make Bharat pure according to shrimat.
2. Play every part in this unlimited play while being soul conscious.Never become body conscious. Become a detached observer and observe the part of every actor.

Blessing:
May you be a conqueror of attachment and an embodiment of remembrance by becoming free from the many types of household.   

In order to become a conqueror of attachment to the many types of household – household of the self, of the divine family, of service and of limited attainments – keep the loving form of BapDada in front of you and become an embodiment of remembrance. By becoming an embodiment of remembrance, you will automatically become a conqueror of attachment. To be free from the household means to finish the consciousness of “I” and to become a conqueror of attachment. Children who become such conquerors of attachment claim a right to the attainment of a reward for a long period of time by making effort over a long period of time.

Slogan:
Remain as detached as a lotus and you will continue to receive God’s love. 
Om Shanti. 

Beautiful Murli Song: BADAL Jaye Duniya Na Badlenge Hum...

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